शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

मानव होने के अधिकार से वंचित किन्नर

                
सामान्यतः हम जिस परिवेश में रहते हैं उसी के हिसाब से हमारे तौर तरीके विकसित हो जाते हैं जिसके अनुसार  हम ताउम्र व्यवहार करते हैं या सोचते हैं।  मनुष्य की आदतें उसके सीखने और सामंजस्य करने पर आधारित होती हैं।  जो एक बार सीख गया या जीवन में जहां जैसे भी सामंजस्य बिठा लिया उसी के मुताबिक़ वह आदत बना लेता है और  जिसे बदलना या बदलने के लिए सोचना उसके लिए बहुत मुश्किल होता है।  सदियों से लैंगिंक विभेद के रूप में पुरुष और स्त्री का विमर्श चला आ रहा है। उभय लिंग और नपुंसक लिंग की भी चर्चा गाहे बगाहे हो जाती है किन्तु पुरुषों या स्त्रियों की लैंगिक विकृतता को लेकर कोई  विमर्श या चर्चा नही अगर होती है तो भी उसे हास परिहास में टाल दिया जाता है । इस प्रकार के लोगों को तीसरी श्रेणी के लोग कहकर औपचारिकता का निर्वहन कर लिया गया।  तीसरी श्रेणी के लोगों ने भी समाज की इस रीति के साथ सामंजस्य बनाकर जीना सीख लिया।  समाज ने किन्नरों को सामजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, साहित्य, खेल  समेत  सारे मामलों में हाशिये पर रखा।  सामजिक व्यवस्था ऐसी है जिसमे  मात्र लैंगिक विकृति के चलते किसी व्यक्ति को मानव होने के लायक ही नही समझा जाता।  किन्नर होना अपराधी, घृणित और अस्पृश्य होना समझा गया या उन्हें देवत्व से जोड़कर समाज से बाहर रखने का पूरा इंतजाम किया गया।  किसी परिवार में यदि कोई विकलांग बच्चा जन्म लेता है तो उसे परिवार उसके जीवनपर्यंत सामजिक सुरक्षा देता है जबकि लैंगिक विकलांग के पैदा होते ही उसके माता पिता उसे त्याग देते हैं या त्यागने पर मजबूर हो जाते हैं।  किन्नरों के लिए बधाई समूह ही एकमात्र विकल्प है जिसमे रह कर वे अपना जीवन निर्वाह कर सकते हैं।  समाज ने गाने बजाने  वाले किन्नरों को मान्यता दी तथा उन्हें शुभ बताया ताकि वह अपने पेशे को दैवीय समझें और उसी में ही लिप्त रहें।  
यहाँ इस बात को जानना अत्यधिक जरुरी है कि क्या वाकई में किन्नरों को  तृतीय लिंग कहना चाहिए।  तृतीय लिंगकी संविधानिक अवधारणा और कानूनी मान्यता के अनुसार  “स्व-पहचानीकृत लिंग या तो पुरुषया महिलाया एक तृतीय लिंग हो सकता है। किन्नर  तृतीय लिंग के रूप में ही जाने जाते हैं, न कि पुरुष अथवा स्त्री के रूप में। इसलिए इनकी अपनी लिंगीय अक्षमता को सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक समूह के कारण एक तृतीय लिंग के रूप में विचारित किया जाना चाहिए।“ किन्तु लिंगीय अक्षमता तो अनेक पुरुष और महिला दोनों हो सकते हैं तो क्या उन्हें भी तृतीय लिंग में शामिल कर लेना चाहिए।  जाहिर है कि किन्नर के लैंगिक  पहचान को लेकर विरोधाभास है।  वस्तुतः किन्नर गर्भ में शरीर के विकास क्रम की वह अवस्था है जब किसी  एक लिंग के निर्धारण की प्रक्रिया होते होते रुक जाती है या कुछ समय बाद दूसरे लिंग का विकास होना शुरू हो जाता है।  इस प्रकार किन्नर के अंग में पुरुष या स्त्री के अंग अविकसित रह जाते हैं या दोनों अंगों का मिलावटी स्वरुप हो जाता है।  स्पष्ट है कि इन्हें तीसरे लिंग में रखना एक कामचलाऊ बात है।  किन्नर होना एक लैंगिक विकृति है न कि कोई  अलग लिंग का प्राणी होना है।  जब हम इन्हें अलग से तीसरे लिंग  की कोटि में रखते हैं तो अनजाने में ही उन्हें यह जताते  है कि वह सामान्य मानव नही हैं बल्कि कुछ विचित्र किस्म के लोग हैं।
शरीर की बनावट के आधार पर समाज की मुख्यधारा से दूर किन्नरों को महिला का वेश बनाकर रहना और उनके जैसी बोली भाषा और व्याकरण का प्रयोग करने की बाध्यता भी उन्हें दलित बनाती है. स्त्री को दोयम दर्जा देने के बाद लगभग उसी तरीके से किन्नरों को लांक्षित अपमानित कर उन पर निर्योग्यताएं लादी गयीं और यह सुनिश्चित किया गया कि वह उन निर्योग्यताओं का अनुपालन करेगे. इस आधार पर अच्छे बुरे किन्नरों का निर्धारण किया गया. मध्यकाल में किन्नरों से शासक वर्ग को कुछ सहूलियतें मिलीं खासतौर से मुग़ल शासनकाल के दौरान उन्हें हरम में जगह इसलिए मिली ताकि निश्चिंतता के साथ वहाँ का देखरेख और निगरानी की जा सके. वर्तमान समय में संविधान ने भारत के प्रत्येक नागरिक को लिंग के आधार पर भेदभाव से मुक्ति दिलाने की बात करता है परन्तु सामाजिक व्यवस्था और सोच कुछ इस तरह की है कि उससे पार पाना अत्यंत मुश्किल काम  है. सबसे कठिन काम प्रचलित परिदृश्य को बदलना है जिसमे किन्नर को एक विचित्र प्राणी समझा जाता है. किन्नरों पर यह विचित्रता समाज द्वारा आरोपित है जिसे उस वर्ग ने स्वीकार कर उसके मुताबिक़ अपने जीवन को ढाल लिया है और परिणाम यह कि हजारों वर्षों  से वह मानव जीवन को महसूस करने के प्रथम मानवाधिकार से वंचित है।  

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रविवार, 13 अगस्त 2017

मैं पूजित होने के लिए कब तक अभिशप्त रहूंगा

मैं पत्थर हूँ 
न देखता हूँ न सुनता हूँ 
न ही कोई संवेदना महसूस करता हूँ 
किसी के दुःख निवारण  की बात तो दूर 
मैं इतना असहाय हूँ कि पड़ा हुआ हूँ सदियों से एक ही  जगह बारहों मौसम 
सोचो मुझे पूजने वालों 
अगर मैं कहने सुनने समझने और  करने वाला होता तो पत्थर  क्यों होता 
इंसान क्यों न होता 
जिस दिन मुझे बोलना आ गया 
उसी दिन मंदिर से बाहर फेंक दिया जाऊंगा और देवत्व से भी च्युत कर दिया जाऊंगा 
क्योंकि बोलते बोलते मुझे चिल्लाना होगा  और चिल्लाते चिल्लाते हांफने लगूंगा 
पसीने से तरबतर 
लेकिन देवताओ को तो  पसीना आता ही नही 
मेरी देह  से पसीना बहते देख लोग समझ जाएंगे कि 
यह देवता नही कोई इंसान  है 
और लात मारकर निकाल देंगे अपने अपने घर के पवित्र कोनों से
बोलने  वाले माँ  बाप की तरह 
सुनो मुझे पूजने वालों 
मैं पूजित होने के लिए कब तक अभिशप्त रहूंगा 
मुझे मुक्त होना है 
इस गूंगे बहरे लूले लंगड़े और निहायत ही लिजलिजे  और निर्जीव  देवत्व से
मैं सांस लेना चाहता हूँ 
हँसना चाहता हूँ रोना चाहता हूँ 
मुझे पूजने वालों 
मैं तुम जैसा होना चाहता हूँ  

रविवार, 2 जुलाई 2017

प्राण नगरी छोड़ आया

जो रचे थे स्वप्न सारे चित्र उनको तोड़ आया।
देह केवल शेष है मैं प्राण नगरी छोड़ आया।

उम्र  भर  की वेदना  श्वांसों  में  है
बांसुरी अपनी कथा किससे कहेगी
मोर  पंखों  ने  समेटा  चन्द्रमा  को
वृंदावन  में राधिका  पागल फिरेगी

पूर्णिमा को युग युगांतर अमावस से जोड़ आया
देह  केवल   शेष  है  मैं प्राण नगरी छोड़ आया।

फूल से छलनी  हृदय  की  अकथ  पीड़ा
रो  पड़ा  है  सुन  के  जाता  एक  बादल
स्नेह की  इक बूँद  को  दल  में  समेटे
ताल में कुम्हला गया धूप से भींगा कमल

पार जाती  नाव  की  मैं  पाल को  मरोड़ आया
देह   केवल  शेष है मैं  प्राण  नगरी छोड़ आया।

प्यास  ही  तैरेगी  अधरों पर निरंतर
शाप से मुरझा गया जल आचमन का
यह  प्रतीक्षा  है प्रलय  की रात  तक
पायलें  देंगी  संदेशा  आगमन   का

जा रही सागर को गंगा फिर हिमालय मोड़ आया
देह  केवल  शेष  है  मैं प्राण  नगरी  छोड़  आया।

शनिवार, 1 जुलाई 2017

सम्मान, गुटिंग, और टोपाबाजी छोड़ो, ब्लॉगिंग से नाता जोड़ो

आदमी लेथन फैलाने से बाज नहीं आता।  अगर आ गया तो उसकी कोटि बदल जाती है।  चाहे धरतीलोक पर रहे या चंद्र लोक पर या कल्पनालोक किसी भी लोक में रहे अपनी खुराफात से बराबर सिद्ध किये  रहता है कि वो आदमी ही है।  हमारे मास्साब बाबू लालमणि सिंह अक्सर कहते थे कि गलती कर सुधरने वाला प्राणी आदमी ही होता है।  जिसे गलती की समझ नहीं वह गदहा होता है।  क्लास में ऐसे कितने गदहों के नाम वह एक सांस में गिना देते थे।  आज का दिन  हिंदी  ब्लॉगिंग  दिवस के रूप में मनाया  जा रहा है तो एक बात तो तय है कि आज अगर बाबू लालमणि सिंह मौजूद होते तो गिन कर बताते कि 'कितने आदमी थे ' ।   

गब्बर सिंह भी यही बार बार पूछते रहे पर कालिया में तो बाबू लालमणि की आत्मा घुसी थी सो दुइये बता पाए काहे से कि जय और वीरू को अपनी गलती का एहसास हो गया था बेचारे खुद को सुधारना चाहते थे पर इस चक्कर में कालिया का बलिदान हो गया। खैर ब्लॉग जगत  कालिया की गति को प्राप्त होने वाला था कि अपने साम्भा यानी खुशदीप भाई ने दूरबीन लगाके देख लिया कि 'रामगढ़' में रामपुरिया  जैसे आदमी हैं। वहीँ से ललकार लगाई और सारे जोधा  फटाक से तुरतई  आदमी बन गए  और फटाफट  ब्लॉग दिवस का ताना बाना बन गया। 


सारे लोग टंकी से उतर आओ।  जइसे एक फेसबूकिया ब्लॉग लिखने लगे समझो ब्लॉग का सतजुग आई गवा।  तुरतई समझो कि गदहे आदमी बन रहे हैं।  अरे हियाँ लिखकर कुछ कमाई धमाई भी हुई जाए।  फिर बसंती के तांगे  पर बैठ के गाना गाते रहना... टेशन से गाडी जब छूट जाती है ... पर पहिले पोस्टिया ल्यो फिर कोई उधम मचईयेगा। ब्लॉग से भागने का एक  कारण ये भी था कि सम्मान, गुटिंग, और टोपाबाजी चरम पर पहुँच गयी थी।  ये सब बातें खेलने कूदने  तक के लिए ठीक हैं पर इन्ही को लेकर पोस्ट पे पोस्ट पेलने और कुतरपात करने ब्लॉगिंग स्खलित हुयी है सुन ल्यो।  सो इन सब से बच गए तो ब्लॉगिंग  के पुराने  और सुहाने  दौर की नदी पुनर्जीवित हो जायेगी। 



बाकी हम आपन जुम्मेदारी लेते तुम पंचन के तुम जानो । 

जय जोहार जय ब्लॉगिंग।  


#हिंदी_ब्लॉगिंग 

शुक्रवार, 30 जून 2017

मंगल ग्रह की बातें सब

ख्वाब देखने की जिद थी लेकिन आँखों में नींद नही
उन्ही  सवालों पर दिल  हारे  उत्तर  की उम्मीद नही ।

मुझको भी तो इश्क हुआ था पर कैसे साबित कर दूँ
चिट्ठी जो तुम तक भेजी थी उसकी कोई रसीद नही।

ये रानाई  जलसे  महफ़िल  मंगल  ग्रह की बातें सब
चाँद  फुलाकर  मुंह  बैठा  है  यह तो कोई ईद नही ।

मौसम  जैसेे  चले  गये  तुम  ऐसे  कोई  जाता  क्या
मुड़ कर भी इक बार न देखा कोई भी ताकीद नही।

रात  चाँदनी  सबा  सुहानी  लहरें  अब  भी उठती हैं
वही समन्दर वही किनारे पर अब  कोई  मुरीद नही।


बुधवार, 28 जून 2017

बारिश,बाइक और चाह।

पूरब में  घुमड़ते बादल गहराते जा रहे थे। गंगा का कछार अभी खत्म नही हुआ था कि हल्की हल्की बूंदे तेज बहती हवाओं के साथ मेरे चेहरे पर पड़ने लगीं। बाइक की रफ़्तार तेज थी। तुम्हारे काले बाल खुलकर हवा में लहराने लगे। एक्सीलेटर पर दबाव बढ़ाने के अनुपात में ही मेरी कमर पर तुम्हारी बाहों की कसावट बढती जा रही थी। कछार पीछे छूट गया सामने सागौन के दरख्त सड़क के दोनों तरफ हवाओं में झूमते नजर आए। बाइक सड़क पर फर्राटा भर रही थी। अब तक मैं सिर से लेकर पैर तक भीग चुका था ठंडी हवाएं बदन को छूकर बरफ बनाने पर तुली थीं पर तुम्हारे धडकनों  की गर्माहट से उनका मकसद बार बार असफल हो जाता। आखिर बादलों के सब्र का पैमाना छलक पड़ा। जोर से बिजली कौंधी और बारिश तेज हो गयी। मेरे कानों में हल्की आवाज आई। बाइक रोक लो फिसलने का डर है। मैंने पीछे मुंह कर के तुमसे कहा, ‘अब भी फिसलने का डर है तुम्हे’। तुमने मुस्कुरा कर सिर पेरी पीठ पर टिका लिया। 

बाइक अपनी रफ़्तार से भागती रही। धुप्प अंधेरा सा छा गया। सड़क पानी से भर गयी। मैंने बाइक को पहली गियर में डाला और  कभी एक्सेलेटर लेते हुए कभी पैर नीचे टिकाते हुए संभाल कर चलाने लगा। तुम मुझसे  अमरबेल सी लिपटी हुयी कभी अपने गीले बालों को पीछे कर रही थी कभी अपने मुंह से पानी हटा रही थी कभी मेरे मुंह से पानी साफ़ कर रही थी। तुम्हारे गीले गेसुओं को देखकर एक ही बात जेहन में आ रहीं थी...

'बरसात का मज़ा तेरे गेसू दिखा गए,
अक्स आसमान पर जो पड़ा अब्र छा गए'। 

थोड़ी देर बाद बारिश मद्धिम पड़ी। सागौन के पेड़ों के पार धान के खेत दिखे। धान के पौधे पानी में डुबकी लगा कर पुलक उठे थे। सड़क से लगा  एक कच्चा रास्ता था जहां से  थोड़ी दूर पर एक छप्पर दिख रहा था। मैंने बाइक वहीँ रोकी और तुम्हारा हाथ पकड़े कच्चे रास्ते पर चल दिया। रास्ते पर घास थी इस वजह से चलने में दिक्कत नही थी। वहाँ छप्पर में एक बूढा अंगीठी पर चाय उबाल रहा था। कोयले सील गये थे पर बूढा अंगीठी फूंक  फूंक कर आग को जलाए रखने का प्रयास जारी रखे था।

बाबा  चाय कैसे पिलाए , मैंने पूछा। उसने हम दोनों को देखा और  मुस्कुराया  बोला,  'चाय  नही चाह पिलाता हूँ बैठो'। एक गीली बेंच पर हम बैठ गये। तुम अपनी चुन्नी निचोड़ने लगी। वह बूढा  तेजी से  अंगीठी में फूंक मारने में जुट गया । तुम्हारे होंठ ठंड से काँप रहे थे। मैंने कहा बाबा जल्दी। बूढ़े ने तुम्हे देखा फिर उसने चाय में कूंची हुयी अदरक डाला और छानकर तुम्हे दिया। मैंने कहा रहने दो बाबा अब हम एक ही प्याली में चाह पी  लेंगे। वह फिर मुस्कुराया। हम प्याली में चाय पीते रहे। थोड़ी गर्माहट आई। छप्पर से पानी टपक रहा था। अंगीठी के धुएं की आड़ से बूढा हमें देखे जा रहा था। हमने चाय पीने के बाद उसे पैसे देने चाहे पर उसने नही लिया। बोला तुम लोग इस चाह को याद रखना। 

पानी बंद हो गया था। शाम होने को थी बादल पतले होकर लाल होने लगे। थोड़ी देर में हमारी बाइक शहर में दाखिला ले रही थी।    

बुधवार, 24 मई 2017

ये कैसी दुनिया होती जा रही है?

ये कैसी दुनिया होती जा रही है? विकास, प्रगति, बेहतरी आदि आदि का कौन सा पैमाना बन रहा मेरी समझ में क्यों नही आता।  हर तरफ आशंका और भय  का माहौल है।  टीवी पर ऐड, क्राइम पेट्रोल, समाचार डराते हैं।  ऐड कहता है आपकी खाल अच्छी नही, आपकी चाल अच्छी नही, आपके बाल अच्छे नही हैं।  प्रत्येक विज्ञापन मर्यादा की रेखा को तोड़ता हुआ समस्या के समाधान की बात करता है जबकि प्रचार के लिए किसी भी सीमा रेखा को तोड़ना आधारभूत समस्या पैदा करता है।  हम दिन भर में हजारो विज्ञापन देखने के लिए अभिशप्त हो गये हैं।  विज्ञापन देखो खरीददारी करो।  आप खरीददारी करके खुश हो सकते हैं कि जो मौजूद है उसका उपयोग करके ? खरीददारी करने से फुर्सत नही मिलनी चाहिए! खरीददारी आपको मालिक होने का सुख प्रदान करती है! और उसका सदुपयोग क्या देता हैं? सदुपयोग वह किस चिड़िया का नाम है ? यह यूज़ एंड थ्रो का समय है।  विज्ञापन आपको हर मर्ज का गारंटीड और शर्तिया  इलाज बताते हैं लेकिन इलाज के बावजूद मर्ज वहीँ का वहीँ बना है बल्कि और आपकी दशा बुरी स्थिति में पहुंच जाती  है।   क्राइम पेट्रोल देखने के बाद किसी पर भी भरोसा करना बेमानी लगता है।  समाचार देखो तो लगता है हम समय के सबसे बुरे दौर से गुजर  रहे हैं जिसमे हिंसा बलात्कार बेईमानी के चरम तक पहुचने की होड़ लगी है।  देश, धरम, प्रेम, भक्ति, बाज़ार पर बहस चल रही है।  

लॉजिक के दौर में अनायास होना या  महसूस करना पिछडापन की श्रेणी में गिना जाने लगा है।  हर तरफ लोग चिल्ला चिल्ली कर रहे कि सतर्कता ही बचाव है।  सतर्क रहिये सतर्क रहिये।  हर तरफ कैमरे ही कैमरे।  आप निगरानी में हैं क्योंकि आपको कोई या आप खुद  नुकसान  पहुंचा सकते हैं।  हर समय अपने स्नायुतंत्रो  को ताने रहिये ढीला मत छोडिये क्योंकि कोई तो है जो आपके लिए खतरा है।  कौन है ? ये कैमरे लगाकर निश्चिंतता पैदा करने की कवायद गुटखे पर लिखी वैधानिक चेतावनी जैसी है।   जब उत्पादन हो रहा है तो क्या उसे रोका नही जा सकता? अरे इतने तनाव और डर में कैसे जिया जाए।  हर पल अपने बचाने की कवायद में लगे हैं और आखिर में जद्दोजहद कहाँ ख़तम होगी ? बीमारी या मौत ? ये कैसी जिन्दगी बनी जा रही ? ये कैसा समाज गढ़ लिया जा रहा है?

दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है?
पढ़े लिखे लोगों को थोड़ी नादानी दे मौला।

मैं इनकार करता हूँ “ मैच्योरटी” को, लॉजिक को, अनुभवों के कनस्तर को, मैं इनकार करता हूँ ऐसी व्यवस्था के दोहरेपन का जहां आदमी को मशीन और मशीन को आदमी में तब्दील किया जा रहा है।  मैं यह स्वीकार करता हूँ कि मेरी प्रवृत्ति अनायास है।  क्या अनायास होने को आप विज्ञान की कसौटी पर मापेंगे तो फिर मैं कार्य-कारण संबंध को भी मानने से इनकार करता हूँ।  फिर तुम कहोगे कि मैं इस दुनिया के लायक नही हूँ।  हाँ यह सच है   मुझे कभी कभी यह जेल जैसी समझ में आती है।  हो सकता है मैं गलत होऊं किन्तु दुनियादारी से  अजीब सी घुटन होती है कभी कभी और इसे परे जाने का मन करता।  सब कुछ इस लॉजिक ने गंदा कर रखा है पानी हवा माहौल।  लॉजिक ने दो विश्वयुद्ध दे दिए।  इस लॉजिक के पार जो कुछ भी है वह निहायत रूहानी होगा।  नेचुरल एक्सेप्टेड होगा।  यदि ऐसा नही तो भी एक नया रास्ता होगा जिस पर चलकर देखने में कोई हर्ज नही।    


गुरुवार, 11 मई 2017

दिल्ली मेट्रो बरबादी की ओर : शहरी मंत्रालय और डीएमआरसीगण कृपया ध्यान दें (DMRC)


दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन द्वारा बढाए गये किराए की दर ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि इस देश में नीति निर्माण और क्रियान्वयन में कोई सामंजस्य नही है अथवा कोई फ्रांस की रानी जैसा शख्स निर्णय ले रहा है और कोई हिटलर जैसा उसे कार्यान्वित कर रहा है। दिल्ली मेट्रो पूरी तरह से राजधानी की लाइफ लाइन है। आपको बताते चलें कि रोजाना लगभग 27 लाख यात्रियों को ढोने वाली दिल्ली मेट्रो को घाटे में बताया जा रहा है।
शहरी विकास मंत्रालय से जुड़े तथ्यों को मानें तो 2013-14 में मेट्रो को लगभग 61 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। दिल्ली मेट्रो ने इस वर्ष ऑपरेशन ऐंड मेंटिनेंस पर 2,322 करोड़ रुपये खर्च किया जबकि उसने जीका से जो लोन लिए हैं, उसके ब्याज के तौर पर 227 करोड़ रुपये चुकाए और डेप्रिसिएशन 1,288 करोड़ रुपये का हुआ। इस तरह उसका खर्च 3,837 करोड़ रुपये वार्षिक रहा अतः दिल्ली मेट्रो को एक साल में 275 करोड़ रुपये का तथाकथित नुकसान हुआ है। मेट्रो घाटा बढ़ने की वजह जो बताई जा रही वह यह कि एक तो ब्याज की राशि बढ़ी है और दूसरा डेप्रिसिएशन के मद में भी राशि बढ़ी है।

मैं इन सब बातों से सहमत होते हुए शहरी मंत्रालय और डीएमआरसी से कुछ प्रश्न करना चाहता हूँ।

1.जब यात्री तिगुने से भी ज्यादा मेट्रो में सफ़र कर रहे हैं तो घाटा कैसे हुआ ?
2.आपने कर्ज लिया कर्ज लेते समय क्या आपने खर्चों का आकलन नही किया था ?
3.यदि आपके पास खर्च करने के पैसे नही थे तो मेट्रो के प्रॉफिट का इंतजार कर के नये प्रोजेक्ट नही लगा सकते थे ?
4.आपने विज्ञापन, मेट्रो कार्ड की जमा राशि वापस करना या मेट्रो यात्रा के घंटे निर्धारित करने जैसे कुछ और कदम नही उठा सकते थे?
5.25 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी तो समझ में आती है किन्तु 66 से 90 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी क्यों ? जो दूर तक जा रहा है उसकी जेब पर डाका क्यों?
6.आपने जनता से राय लेकर किराया बढ़ोत्तरी का प्लान बनाया था पर जनता से बिना राय लेकर आपने मनमानी थोप दी।
7.शहरी मंत्रालय ने किराया बढाने पर सहमति देते वक्त कल्याणकारी राज्य और अच्छे दिनों की रूपरेखा को भूल बैठा था क्या?
8.विद्यार्थियों महिलाओं और बुजुर्गों का ख्याल रखने जैसा क्रूर फैसला आप कैसे ले सकते हैं। मेट्रो में महिलाये सुरक्षित सफ़र करती हैं। बुजुर्ग आराम से लम्बी दूरी तय कर लेते हैं विद्यार्थियों के अध्ययन के समय पैसे दोनों में बचत होती है इन सबका ध्यान क्यों नही रखा गया ?
9.गरीब तबका मेट्रो में चलकर खुद को मुख्य धारा से जोड़कर देखने की कोशिश करने लगा था वह फिर से बस की छत के ऊपर दरवाजे पर या कैब में भेंड बकरियों की तरह ठूंस कर आने को अभिशप्त होगा। योजना बनाते समय इन बातों का ध्यान क्यों नही रखा गया।
10.उच्च एवं मध्यम वर्ग धीरे धीरे मेट्रो से आने जाने को तरजीह देने लगे थे किन्तु किराया बढ़ाने से वह वापस कार की तरफ मुड़ जायेंगे जिससे भयंकर पर्यावरण प्रदूषण, सड़कों की बुरी दशा और ट्रैफिक समस्याएं फिर से दिल्ली को अपना ग्रास बनाएंगी।
11.मेट्रो से यात्रियों के कम होने से मेट्रो और घाटे में चली जायगी जहां से वह कभी उबर नही पाएगी।

यह मात्र अर्थ से जुडा मुद्दा नही वरन भयंकर नीतिगत खामियों का पुलिंदा है यदि उपर्युक्त बिन्दुओं पर विचार नही किया गया तो दिल्ली मेट्रो को कानपुर की टेक्सटाइल मिलों के खण्डहर में बदलने से कोई रोक नही पायेगा। अस्तु मेट्रो नीति निर्माताओं और शहरी मंत्रालय से अनुरोध है कि दिल्ली के लोगों के हित में मेट्रो के हित में अपने निर्णयों पर पुनर्विचार करें।