शनिवार, 18 दिसंबर 2010

आये है जीने के लिए या मृत्यु के लिए जीते है

प्रत्येक बार अंतरात्मा जन्म लेता और प्रत्येक बार सांसारिक पदार्थो से मन प्राण और शरीर की रचना होती है. यह रचना भूतकाल के विकास और उसके भविष्य की आवश्यकता के अनुसार होती है. इसी बात को लेकर मन में कुछ घुमड़ रहा था, सोचा आपसे भी चर्चा करू. सुझावों व टिप्पणियों का हार्दिक स्वागत है












मेरे से इतर क्या संभव है
वह परिभाषा जो मै होती है
मै सृष्टि की रचना हूँ
या सृष्टि मुझमे ही बनती है

विराट में निहित एक बिंदु
या विराट बन गया बिंदु
सागर में बूँद समाई है
या बूँद में बसे महासिन्धु

आये है जीने के लिए
या मृत्यु के लिए जीते है
कही मृत्यु तो वही नहीं
हम जिसको जीवन कहते है.


.................... सुधी पाठको के उत्तर की प्रतीक्षा में