रविवार, 12 दिसंबर 2010

और अफज़लो की सजा बदल रही है.











महबूब-ए-मुल्क की हवा बदल रही है,
ताजीरात-ए-हिंद की दफा बदल रही है.

अस्मत लुटी अवाम की कहकहो के साथ,
और अफज़लो की सजा बदल रही है.

बारूदी बू आ रही है नर्म हवाओ में,
कोयल की भी मीठी ज़बा बदल रही है.

सुबह की हवाखोरी भी हुई मुश्किल,
जलते हुए टायर से सबा बदल रही है.

सियासत ने हर पाक को नापाक कर दिया,
पंडित की पूजा मुल्ला की अजां बदल रही है.

कहने को वह दिल हमी से लगाए है,
मगर मुहब्बत की वजा बदल रही है.

दुआ करो चमन की हिफाजत के वास्ते,
बागबानो की अब रजा बदल रही है।

निगहबानी करना बच्चो की ऐ खुदा,
दहशत में मेरे शहर की फ़ज़ा बदल रही है.