बुधवार, 1 दिसंबर 2010

किन्तु मुझको है भरोसा, आओगी तुम मुस्कराकर.











बीता रात का तीसरा पहर
तुम नहीं आये
आधा हुआ चंदा पिघलकर
तुम नहीं आये

मै अकेला हूँ यहाँ पर
यादो की चादर ओढ़कर
रात भर पीता रहा
ओस में चांदनी घोलकर

फूल खिले है ताजे या तुम
अपने होठ भिगोये हो
हवा हुयी है गीली सी क्यों
शायद तुम भी रोये हो

अब सही जाती नहीं प्रिय
एक पल की भी जुदाई
देखकर बैठा अकेला
मुझ पे हसती है जुन्हाई

बुलबुलें भी उड़ गयी है
रात सारी गीत गाकर
किन्तु मुझको है भरोसा
आओगी तुम मुस्कराकर.

किन्तु मुझको है भरोसा
आओगी तुम मुस्कराकर.

बूँद आख़िरी ख़त्म हुयी होंठो पर प्यास रही बाकी





















बूँद आख़िरी ख़त्म हुयी होंठो पर प्यास रही बाकी,
बंद हुए सब मयखाने पीने की आस रही बाकी.

सैय्यादो की बस्ती में पंछी किससे फ़रियाद करे,
फरमान मौत का सुना दिया इलज़ाम लगाना है बाकी.

कालिख भरी कोठरी से बेदाग़ गुज़रना मुश्किल है,
अब तक कोरे दामन पर तोहमत का लगना है बाकी.

दावा है उनका पहुचेगे इक दिन चाँद सितारों तक,
लेकिन पहले वह तय करलो जो दिलो में दूरी है बाकी.

पूरब में उड़ाती हुयी घटाओ  इक दिन मेरे घर आना,
बीत गए सावन कितने पर मेरा आँगन है बाकी.

बूँद आख़िरी ख़त्म हुयी होंठो पर प्यास रही बाकी,
बंद हुए सब मयखाने पीने की आस रही बाकी.