सोमवार, 29 नवंबर 2010

तुम्ही से रूठना तुमको मनाना अच्छा लगता है













अकेले में तुम्हारी याद आना
अच्छा लगता है,
तुम्ही से रूठना तुमको मनाना
अच्छा लगता है।

धुन्धलकी शाम जब मुंडेर से
पर्दा गिराती है,
सुहानी रात अपनी लट बिखेरे,
पास आती है,
तुम्हारा चाँद सा यूँ छत पे आना,
अच्छा लगता है।

फिजाओं में घुली रेशम नशीला
हो रहा मौसम,
ओढ़कर फूल का चादर सिमटती
जा रही शबनम,
हौले से तुम्हारा गुनगुनाना
अच्छा लगता है।

अकेली बाग़ में बुलबुल बिलखती है
सुलगती है,
रूमानी चांदनी मुझपर घटा बनकर
पिघलती है,
तुम्हारा पास आना मुसकराना
अच्छा लगता है

अकेले में तुम्हारी याद आना
अच्छा लगता है।

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

इंसान की मुकम्मिल पहचान मेरे राम।



















मुल्क की उम्मीद-ओ -अरमान मेरे राम,
इंसान की मुकम्मिल पहचान मेरे राम।

शिवाला की आरती के प्रान मेरे राम,
रमजान की अज़ान के भगवान् मेरे राम।

काशी काबा और चारो धाम मेरे राम,
ज़मीन पे अल्लाह का इक नाम मेरे राम।

दर्द खुद लिया दिया मुसकान मेरे राम,
ज़हान में मुहब्बते -फरमान मेरे राम।

रहमत के फ़रिश्ते रहमान मेरे राम,
सौ बार जाऊ तुझ पर कुरबान मेरे राम।

हर करम पे रखे ईमान मेरे राम,
तारीख में है आफताब नाम मेरे राम।

वतन में मुश्किलों का तूफ़ान मेरे राम,
फिर से पुकारता है हिन्दुस्तान मेरे राम।

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

'काफ़िर है वो जो कायल नहीं इसलाम के'

एक प्यारी सी  बात
'काफ़िर है वो जो कायल नहीं इसलाम के'

दूसरी  प्यारी बात
'लाम* के मानिंद  है गेसू** मेरे घनश्याम के,
 काफ़िर है वो जो कायल नही इसलाम के'

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* उर्दू में लाम  ل   के आकार का होता है कृष्ण के बाल** भी इसी तरह मुड़े हुए थे.

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

मुझको तुम आवाज ना देना...







मुझको तुम आवाज ना देना
पलक भिगो कर नहीं देखना
मै आवारा बादल हूँ तुम
मुझे देवता मत कहना

अपना ही नहीं है ठौर कोई
बेबस करता है और कोई
हवा ने बंदी बना लिया तुम
मेरी बंदिनी मत बनना

सपनो से बसा संसार कभी
मत कहना इसको प्यार कभी
विपरीत दिशाए है अपनी
तुम मेरी संगिनी मत बनना

कल परसों में  है मिटना
कैसे कह दू तुमको अपना
अंतिम यही नियति मेरी
इसे प्रेम तुम मत कहना

सोमवार, 22 नवंबर 2010

सीख लो ...



















पतझड़ो के मौसम में मुस्कराना सीख लो 
हँसते हुए जहान को अपना बनाना सीख लो


फूल अगर मीत है तो कांटे भी गैर नहीं
हर किसी को अपने दिल से लगाना सीख लो


कुछ सुनाओ, गुनगुनाओ ये खामोशी ठीक नहीं
बुलबुल के पास जाकर कोई गीत गाना सीख लो


चाँद नहीं रात में तो रंज किस बात का
अमावास में धरती को जगमगाना सीख लो


सौ बार जनम लेने से इक दोस्त मिलता है
दोस्ती को जनम जनम तक निभाना सीख लो


'वो' रूठते है तुमपे अपना हक जमाने के लिए
रूठे हुए महबूब को फिर से  मनाना सीख लो

रविवार, 21 नवंबर 2010

जड़ता की ओर बढ़ते कदम; रक्तदान और अंगदान करना हराम

दारुल उलूम देवबंद ने एक  (अमर उजाला काम्पैक्ट २१नवम्बर पृष्ठ 20) फतवा जारी करके रक्तदान और अंगदान को हराम घोषित किया है. हालांकि उसमे यह भी जोड़ा कि करीबी रिश्तेदारों को खून दिया जा सकता है.आगे यह भी है कि कोई इंसान यदि अपनी उंगली काटे या खुद को गोली मारे तो वह गुनाह गार है क्योकि शरीर अल्लाह का दिया हुआ है और इंसान इसका मालिक नहीं है. दारुल उलूम देवबंद के दारुल इफ्ता के मुफ्ती जैनुल इस्लाम ने कहा कि जो चीज़ इंसान कि नहीं है उसे किसी दूसरे को देने का हक नहीं है.
अब मेरा प्रश्न है....
१.धरती पर कोई भी चीज़ इंसान की नहीं है फिर उनका इस्तेमाल करके सारे इंसान अल्लाह के विरुद्ध कार्य करते है ?
२. खुद की उंगली काटे तो हरामी, और जानवर जबह करे तो कुर्बानी ये दोगलापन क्यों? क्या जानवर इंसान ने बनाये है?
३. करीबी रिश्तेदार को खून दिया जा सकता है. जब  इस्लाम के अनुसार सारे मुसलमान आपस में भाईचारे से बंधे है तो करीबी कौन या दूर का कौन?   अपना मर रहा है खून चढ़ा दो गैर मरे तो मरने दो. वाह....... क्या भाव है?
४.दोगलेपन की हदे तोड़ता हुआ फतवा जड़ता और अज्ञानता के गहरे अँधेरे में अपने लोगो को धकेले के अतिरिक्त और कितना उपयोगी होगा ?

शुक्रवार, 19 नवंबर 2010

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं..

मै बहन अपर्णा से क्षमा मंगाते हुए इस पोस्ट को लिखने जा रहा हूँ. वैसे मै तो चाँद पर जाना चाहता हूँ. क्यों? क्योकि यहाँ आग लगी है. लेकिन भागना ही नहीं आया . यही रहूगा और अपनी धरती अपना देश को बुरी नज़र से बचाने का काम करूगा.शुरुआत इस ब्लॉग जगत से करता हूँ या कर दिया हूँ. समाजशास्त्री  होने के कारण व्यक्ति के व्यवहारों के पीछे छिपे कारणों को मै जान सकता हूँ. कोई व्यक्ति दो तरीके से सोचता है. प्रथम मूल प्रवृत्तियों द्वारा और दूसरा सीखा हुआ. हम सीखने के दौरान गलतिया  करते है फिर सुधारते   है. लेकिन जन्मजात प्रवृत्तियों में सुधार की गुन्जाईस होना गधे के सर पर सीग उगने जैसा  है.
गलतियों और सुधार पर कुछ श्रेणिया बनी है.........
जो गलती छोड़ कर बैठा उसे भगवान कहते है
समझता जो ना गलती को उसे हैवान कहते है
सुधरता कर जो गलती को उसे इंसान कहते है
करे गलती पे जो गलती उसे शैतान कहते है.
मै एक बात स्पष्ट  कर दू कि यह मामला व्यक्तिगत है रीति-रिवाजो और परम्पराओं धार्मिक मसले सीखे हुए व्यवहार के अंतर्गत नहीं आते वरन लादे गए होते है. मनुष्य अपने विवेक के अनुसार उसमे आवश्यक सुधार कर अपनाता है.
ये तो रही सैद्धांतिक बात.
अब व्यवहारिक बात की जाए
इस ब्लॉग जगत में तमाम ऐसे लोग आ गए है. जो पहली कटेगरी के है. ये बजबजाती  नाली के वे  बिलबिलाते कीड़े है जो यह समझते है कि सम्पूर्ण विश्व के आनंद और ज्ञान का स्रोत एकमात्र बजबजाती नाली है. ये गन्दगी में लोटते सूअर सरीखे लोग सारे दुनिया को गंदा करे उसे अपने जैसा बनाना चाहते है.  जैविकीय हस्तांतरण और समजीकीय हस्तांतरण तो प्राप्त करते है किन्तु बिना विवेक के. यही विवेक हैवान  और इंसान में भेद करता है. 
मेरा समस्त(सूअर बुद्धि वालो को छोड़ कर क्योकि इनको कुछ सिखाया या समझाया नहीं जा सकता है ) ब्लोगर्स से अनुरोध है कि वे इन नाली के कीड़ो और गन्दगी के सुअरों का बहिष्कार करे.
पाठक गण इनके बारे में अच्छी तरह से जानते है
अंत में दुष्यंत कुमार जी के शब्दों में....

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी
शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए

बुधवार, 17 नवंबर 2010

महीना दिसम्बर हुआ










कोहरे का घूंघट ,
हौले से उतार कर ।
चम्पई फूलों से ,
रूप का सिंगार कर ॥

अम्बर ने प्यार से   ,
धरती को जब छुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

धूप गुनगुनाने लगी ,
शीत मुस्कुराने लगी ।
मौसम की ये खुमारी ,
मन को अकुलाने लगी ॥

आग का मीठापन जब ,
गुड से भीना हुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

हवायें हुयी संदली ,
चाँद हुआ शबनमी ।
मोरपंख सिमट गये ,
प्रीत हुयी रेशमी ।।

बातों-बातों मे जब ,
दिन कही गुम हुआ ।
बरफीली ठंडक लिये ,
महीना दिसम्बर हुआ ॥

रविवार, 14 नवंबर 2010

मै अक्सर कल्पना करता हूँ कि ...

मेरी पिछली दो पोस्टो को पढने के बाद मेरी बहन अपर्णा ने मुझसे कहा कि गधो को अच्छा सबक मिल गया है . अब गदहपचीसी छोड़ कर ऐसी रचनाओं का सृजन करो जिनको पढने के बाद मन में सकारात्मकता के  आनंद के भाव उठे. वैसे ही इस दुनिया में लड़ाई झगडे की भरमार है. मैंने उससे कहा, भद्रे! मै खुद नहीं चाहता कि मुझे किसी से तकरार करनी पड़े किन्तु जब कोई  व्यवस्था को बिगाड़ने की बात करता है तो उनको सही रास्ते पर ले आना कर्तव्य बन जाता है.

बहरहाल मै  सुधी पाठको को जमालो और शर्माओं की दुनिया से दूर ऐसी जगह ले चलता हूँ जिसकी मै अक्सर कल्पना करता हूँ.
कुछ झलकिया देखिये.....

सावन भादों जल बरसेगे
नदियों के तट मिल जायेगे
वो भी दिन आएगा जब
धरती फिर से मुस्कायेगी

रिश्तों की बरफ पिघल जायेगी
बिछड़े दिल मिल जायेगे
टूटे बंधन को जुड़ना होगा
तुलसी के दीप  जल जायेगे

दूर प्रदूषण होगा जीवन से 
तन से मन से घर आँगन से
यमुना का जहर मिटेगा इक दिन
गंगा पावन हो जायेगी

शरदपूर्णिमा का  चन्दा
धरती पर मधु बरसायेगा  
किसी की पैजनिया खनकेगी
किसी की मुरली गायेगी

मीठी अमराई महकेगी
सुबह शाम पंछी  चहकेगे
पायल छनकाती सखियों के संग
पनघट पर गोरी आयेगी

वो भी दिन आएगा जब
धरती फिर से मुस्कायेगी....

शुक्रवार, 12 नवंबर 2010

एक पत्र-पुष्प अनवर जमाल के नाम



http://pachhuapawan.blogspot.com/2010/11/blog-post_11.html
अनवर जमाल साहब आप की भाषा उतनी ही बढ़िया है जितनी पुरानी फिल्मो में एक अभिनेता थे 'अजीत'. जो बड़े प्रेम से कहते थे 'इसको हैमलाक पिला दो आसानी से मर जाएगा'.रही बात अक्ल के अंधे की तो यह कोई बुरा शब्द नहीं है. लगता है आप जहा से पढ़े है वहा मुहावरे वगैरह नहीं पढाये जाते थे. अक्ल का अँधा अल्प ज्ञानी को कहते है. सत्य को अपने हितो के आधार पर परिभाषित करना अल्पज्ञान ही कहलाता है.रही बात की आपने मुझे अपना भाई कहा तो क्षमा चाहूगा क्योकि आप तो पूरी शिद्दत से सबको 'अपना' बनने में जुटे ही है. जमाल साहब कभी किसी के बन कर तो देखिये. मैने आपके लिए तुम शब्द का प्रयोग किया था. तुम अनौपचारिक शब्द होता है किसी निकट के व्यक्ति को संबोधित करने इस शब्द का प्रयोग होता है. लेकिन मैंने ये मिस्टेक सुधार ली . आप की कमी तो मै बताना नहीं चाहता क्योकि आपको मै तथाकथित मर्मज्ञों की श्रेणी में रखा पाया था किन्तु आपने इस बात को पूछ कर मेरे उस भ्रम को तोड़ दिया. आभार. पहली बात, आप कभी कानपुर आये है कभी बेकन गंज और हबूदा अहाते में गए है अगर नहीं तो आइयेगा . भूख से बिलबिलाते बच्चे आपका अभिनन्दन करेगे. कोई भी व्यक्ति चिल्ला कर यह कहे को इस्लाम का या हिन्दू धर्म का पक्का हिमायती है. मै उसे नहीं मानता धर्म की पहचान व्यक्ति के कर्म से होती है. दूसरी बात की आप कहते है सनातन धर्म( अन्य भी ) कल की बात थी इस्लाम आज की बात है. इसका क्या मतलब है ? जो और धर्म के अनुयायी है परोक्ष रूप से या वास्तविक रूप से इस्लाम के ही अनुयायी है. ऐसा कह कर आप क्या जताना चाहते है ? आपके कहने का मतलब इस्लाम को छोड़ कर सारे धर्म कल की बाते हो गए है. मै इस्लाम का उतना ही सम्मान करता हूँ जितना के स्वधर्म का. किन्तु यह बात मुझे कतई बर्दाश्त नहीं है की किसी धर्म को दूसरे धर्म ऊपर रख कर वाह वही लूटी जाय.

आपके  लिंक मैंने देखे. एक बात समझ लीजिये जादू कभी धर्म नहीं होता.

सनातन धर्म और दयानंद के बारे में कुछ कहने से पहले 'शाश्त्रार्थ परंपरा' के बारे में जानिये.

और अंत में में आपने पूछा की मै किस दुनिया में रहता हूँ तो मै आपको बताता चलू कि कम से कम मै आपकी दुनिया में तो नहीं रहता.

हिन्दू कहे मोहे राम पियारा तुरक कहे रहिमाना
आपस में दोउ लड़ी मुए मर्म ना कहू जाना

कबीर दास जी को अपने करीब लाये तो कुछ ज्ञान चक्षु खुले आपके

दयालु अल्लाह आपको स्वस्थ और सानंद रखे.

आमीन

गुरुवार, 11 नवंबर 2010

बी. एन. शर्मा और अनवर जमाल की गदहपचीसी

'दंभिन निज मत कल्प करी प्रगट  किये बहु पंथ' आज से सैकड़ो साल पहले लिखी इस पंक्ति सार्थकता मुझे तब दिखी जब तथाकथित धर्म मर्मज्ञों के ब्लॉग पर आना हुआ. कहने की जरूरत नहीं है कि ये मर्मज्ञ द्वय कौन है. अभी बूझ नहीं पाए तो बताते चले ये स्वनामधन्य बी. एन शर्मा और अनवर जमाल है. जो दावा करते है कि उनके मतानुसार की गयी व्याख्याए ही संसार के अंतिम सत्य है.
बी. एन शर्मा बहुत ही अनर्गल और अश्लील शब्दों में इस्लामिक धर्मग्रथो के बारे में  लोगो को बताने में लगे है. और उनको मिल रही बेनामी टिप्पड़ियो  को देखा जय तो यह प्रतीत होता है कि इसमें से आधी टिप्पणी तो स्वयं शर्मा की है बाकी उन लोगो की है जो कुकर्म  करने की इच्छा मन में दबाये हुए है  किन्तु माहौल नहीं बन रहा है. शर्मा कि तरफ से एक मंच मिलने से ये लोग अपनी भड़ास निकालने में लगे है. तुलसीदास जी का कथन है
जो कह झूठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना।। तो इस्लामिक मामलो की मसखरी बनाकर शर्मा गुनवंत बनने चले है.ऐसे लोगो ने हिन्दू धर्म को नुकसान पहुचाने के अलावा और कोई योगदान नहीं दिया है. ये घृणा के अग्रणी ध्वजवाहक है जो कीड़ो और सियारों की बजे मानव के रूप में इस धरती पर टपक पड़े. शर्मा कुछ शर्म करके अपने परिवार मोहल्ले और गाव ये शहर जहा रहते हो वहा की कमियों को पहचानो  और दूर करने का प्रयास करो तो परलोक सुधर जाएगा नहीं तो  प्रारब्ध  के पुण्य समाप्त होते ही रौरव नरक के दर्शन होगे.
अनवर जमाल दूसरे मर्मज्ञ है जो दावा करते है कि वैदिक धर्म का लेटेस्ट वर्जन इस्लाम है. अब जरा जमाल बाबू की चतुराई देखो सनातन धर्म की थोड़ी सी तारीफ  करके पूरे सनातनियो को हिन्दुओ को परोक्ष रूप से मुसलमान बता रहे है. इन्होने उद्विकास के सिद्धांत का सहारा लिया है क्यों ना ले आखिर डाक्टर साहब का ज्ञान गजनवी और औरंगज़ेबों की परंपरा बढ़ने में सहायक नहीं होगी तो ये अपने आकाओं को क्या मुह दिखायेगे. जमाल ज़रा अपने गिरेबानो में झाँक कर देखो.
मुझे मालूम है नही देखोगे क्योकि ये बात तुम भी अच्छे से जानते हो तुम अपनी किसी भी किताब या मत कि पुनर्व्याख्या नहीं कर सकते यदि हिम्मत है तो किसी एक लाइन का विश्लेषण करो. सनातनी जब विद्वत्ता की पहली सीढ़ी पर चढ़ता है तो उससे भाष्य लिखने को कहा जाता है क्योकि
सनातन धर्म में सभी के मत को सामान महत्व दिया जाता है. जमाल बाबू
तुम्हारी यही जड़ता तुम्हारे पतन का कारण बनेगी.
कोई भी धर्म मनुष्य से ऊपर नहीं है. दुनिया में जो कुछ है वह इसलिए कि मानवमात्र का  अधिकतम कल्याण हो. इन अकल के अन्धो को ये नही दीखता कि जिसे ये सम्पूर्ण कहते है वो मात्र एक इकाई है 
और अंत में 
अयं निजः परोवेत्ति गणना  लघुचेतसाम
उदारचरितानाम ,वसुधैव कुटुम्बकम 
अर्थात यह मेरा है वह तेरा है  ऐसा सोचने वाले छोटी बुद्धि वाले है. उदार लोगो के लिए समस्त धरती परिवार है .

बुधवार, 3 नवंबर 2010

उसी मासूमियत पे रहनुमाई झूम जाती है

आज तक मैंने ब्लॉग पर जो कुछ भी लिखा है वह मेरी ज़िंदगी के तजुर्बे और महसूस करने पर आधारित रहा है.मैने  अपनी पोस्ट के माध्यम से अपने को उकेरने की कोशिश की है. मै इस बात को मानता हूँ कि रचना करना ही जीवन है. ब्लोगिंग के माध्यम से मै अपनी जीवन्तता बनाये रखने का प्रयास करता हूँ.इस क्रम में कदाचित दूसरो को खुशी का एक टुकड़ा भी दे पाऊ तो मेरी जीवन्तता और रचनात्मकता दोनों सार्थक प्रतीत होने लगती है. कल मेरे एक फालोवर ने पूछा कि आप कि रूमानी कविताओं की नायिका कौन है. उसके उत्तर में मै  आज आपको मै वो गीत भेट करने जा रहा हूँ जो मैंने आज से पाच साल पहले लिखा था. उस समय एक लडकी मुझे  ना जाने क्यू बहुत अच्छी लगती थी.वो जब मुझसे बात करती थी तो आसपास के लोग जाने क्यू मुझसे अजीब किस्म का व्यवहार करने लगते. शायद उसका मुझसे बात करना लोगो को अखरता था. कुमार नयन की एक ग़ज़ल के चन्द अशरार है
नज़र नीची लबों में  हो दबी मुस्कराहट तो
उसी मासूमियत पे रहनुमाई झूम जाती है
गजलसे जब तुम्हारे प्यार की खुशबू छलकती है
कसम अल्लाह की सारी खुदाई झूम जाती  है
लेकिन मेरे साथ तो उल्टा हुआ. सारी खुदाई मेरे विरुद्ध ...........
ग़ालिब बोल पड़े ये इश्क नहीं आसाँ एक आग का दरिया है और डूब के जाना है.
मैंने जो महसूस किया आप भी उससे रूबरू होइए.....
कुछ अपने छूटा करते है
कुछ शीशे टूटा करते है
बालू के बने घरोंदे तो
इक  दिन फूटा ही करते है
तारो से क्या लेना देना
यद्यपि आते है आँगन में
मेरा चाँद निकलेगा इक दिन
तारे टूटा ही करते है
हम अभिमानी निर्भय होकर
बीच राह से गुजरेगे
जब बाग़ से फूल चुराया है तो
माली रूठा ही करते है...
              आपको बता दे कि वह लडकी आज भी मेरे साथ रहती  है मेरी माँ उससे कहतीं  है.. अरे बहू जरा चाय तो बना. किरण कहती है जी मांजी .......